हाल है अब बद से बदतर क़र्ज़े में
फ़ोन मैं और है मेरा घर क़र्ज़े में
आस अच्छे साल का देकर ये फिर
डूब जाता है दिसंबर क़र्ज़े में
उन पहाड़ों से निकलकर मिलती है
ये नदी या है समुंदर क़र्ज़े में
पहले जैसे कौन ख़त है भेजता
चुग के दाना है कबूतर क़र्ज़े में
याद है क्या रात तुमको सर्द की
आज भी है एक चद्दर क़र्ज़े में
ज़िंदगी में उस सेे तू कुछ पल मिला
देख सौरभ अब मुक़द्दर क़र्ज़े में
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