फ़िक्र के आईने में जब भी मुझे देखता हूँ
ख़ुद को दरिया से फ़क़त बूंद लिए देखता हूँ
बे ख़बर, रोड़ पे इन भागते बच्चों को मैं
कितनी हसरत से थकन ओढ़े हुए देखता हूँ
कितनी उम्मीद से आया था तुम्हारे दर पर
तुम ने बस यूँं ही मुझे कह दिया है देखता हूँ
एक मंज़र को तका करता हूँ पहरों तक मैं
पूछने लगते हैं अहबाब किसे देखता हूँ
कई किस्से तेरे चेहरे पे उभर आते हैं
जब भी इक अर्सा गुज़रने पे तुझे देखता हूँ
मुझ को हर बार मेरी प्यास डरा देती है
गर ज़रा सा कभी दरिया के परे देखता हूँ
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