रेत जैसा फिसल गया मुझ सेे
वक़्त आगे निकल गया मुझ सेे
वो जो सूरज था मेरे हिस्से में
शाम से पहले ढल गया मुझ सेे
माँ ने फेरा था सर पे हाथ मेरे
ख़ुद-ब-ख़ुद ख़तरा टल गया मुझ सेे
वो जिसे चुप करा न पाया कोई
जाने कैसे बहल गया मुझ सेे
तुझको तो क़द्र-ए-कामयाबी है
फिर भला क्यूँँ तू जल गया मुझ सेे
सब्र बे-इंतिहा किया था सो
सब्र का था जो फल गया मुझ सेे
वक़्त बदला तो सब बदलने लगे
सिक्का खोटा भी चल गया मुझ सेे
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