क़िस्मत के दाँव पर यहाँ किसका है बस चला
मैं बच गया था दूध से पर छाछ से जला
तुम प्यार चाहते हो ज़माने से भूल है
शायर कोई भला कभी महलों में है पला
दुनिया पे से यक़ीन मिरा उठ गया था जब
इक शख़्स ने मुझे बड़ी तरतीब से छला
बरसों से जो सँभाल के रक्खा था एक ख़्वाब
मलबे के नीचे दब गया जब आया ज़लज़ला
वो बीच ज़लज़ले के उसे ढूँढ़ने में गुम
बेटा नहीं रहा ये बाद में पता चला
अब तो अमान होने लगा है यक़ीन ये
उसके ही हक़ में आएगा मुन्सिफ़ का फ़ैसला
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