धूप इतनी है कि छाया भी ठिकाना चाहती है
आज कल वो साथ मेरा छोड़ जाना चाहती है
चाहती है साथ देना हर घड़ी में हर समय पर
चिलचिलाती धूप में दामन बचाना चाहती है
रूह मेरी क़ैद होकर रह गई है जिस्म में ही
वो बहुत जल्दी ही इस सेे भाग जाना चाहती है
दरमियाँ शय है हमारे तुम उसे कुछ नाम दे दो
जो तुम्हें मुझ सेे मुझे तुम सेे मिलाना चाहती है
रास्ते सब के सभी उस ओर ही जाकर मिले हैं
ज़िंदगी ये जिस तरफ़ लेकर के जाना चाहती है
नाम उसका है बहुत प्यारा मगर ये आरज़ू है
बस मिरा सरनेम वो पीछे लगाना चाहती है
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