
अब मुझे आराम करना है मिले मंज़िल मिरी भी
अब थकन होने लगी सच में सफ़र की इस थकन से
बाग़बाँ होते हुए तेरे यहाँ कैसा सितम है
रोज़ कोई तोड़ लेता है गुलो-नर्गिस चमन से
— Azhan 'Aajiz'
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