है ख़बर मुझ को मुक़म्मल जानता कोई नहीं
इसलिए मेरा मुसलसल राब्ता कोई नहीं
गाँव हूँ जैसे कोई मैं जिस में रहते सब मगर
देर तक बसना वफ़ा से चाहता कोई नहीं
दुख ये मुझ को खा रहा है जाने क्या है मुझ में जो
मैं अगर बोलूँ नहीं तो बोलता कोई नहीं
ख़ुद-कुशी करना अगर चाहूँ तो मुश्किल है बड़ी
मुझको मेरी हरकतों पर टोकता कोई नहीं
देखती हूँ सब को इतनी आस से मैं हर दफ़ा
हाल तो सुनते हैं सब पर पूछता कोई नहीं
मसअला मेरा यही तो है कि मुझ को चाहिए
प्यार अपनों का फ़क़त ये मानता कोई नहीं
'भूमि' ज़्यादा ध्यान मत दो इन सभी बातों पे तुम
ख़ुद ही पोछो अपने आँसू पोछता कोई नहीं
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