जैसा मैं ने चाहा था वैसा नहीं था
बातें फिर भी ठीक थी लहजा नहीं था
मैं ने भी उसको नहीं देखा पलट कर
और उसने भी मुझे रोका नहीं था
एक तो वो भी किसी को चाहती थी
और अच्छा मैं उसे लगता नहीं था
क्या सितम है तुम पे ग़ज़लें लिख रहें हैं
हमको ये दुख तो कभी लिखना नहीं था
उस
में उतरा तो हुआ मालूम मुझको
वो कुआँ तो था मगर गहरा नहीं था
दूसरों के तो हमेशा आया है काम
वो जो अपना ध्यान भी रखता नहीं था
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