kya hi sitam nikale ga.e us jahaan se | क्या ही सितम निकाले गए उस जहान से

  - Shadab Asghar

क्या ही सितम निकाले गए उस जहान से
हम आसमाँ के लोग थे जीते थे शान से

ऐसा नहीं है वो हमें भाता नहीं, रक़ीब
बस तंग आ गया हूँ मैं इस खींच तान से

तू चाहता है मैं तेरी जानिब को फिर चलूँ
मैं तीर जो निकल गया तेरी कमान से

मिन्हा ख़लकनकुम व फ़िहा नोईदकुम
मिट्टी भी ली गई मिरी हिन्दोस्तान से

क्या हो अगर ये नर्क हो कोई जहान का
क्या हो अगर न आए कोई आसमान से

वा'दा तो कर गया है दिल-ए-ना-तमाम से
आदत है जिसकी पल में मुकरना जुबान से

कोई दोस्त ही नहीं मिरा इक तुझको छोड़ के
तू है मिरा तो लेना ही क्या दो जहान से

  - Shadab Asghar

Zulm Shayari

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