क्या अब यही है सच कि मुहब्बत नहीं रही

मतलब यही के तुम को भी हसरत नहीं रही

कल रात तुम ने हम को निकाला जो बज़्म से
यारों में बात क्या रहे इज़्ज़त नहीं रही

जिस जिस भी कूचे में गए खाए हैं ज़ख़्म ही
अब और दिल लगाने की हसरत नहीं रही

तन्हाई भी है दर्द भी है तेरा ग़म भी है
अब मेरे कमरे में कोई ख़ल्वत नहीं रही

अब तो सितम ये है के सितमगर ने कह दिया
अब और सितम को तेरी ज़रूरत नहीं रही

हम जिस के पहलू से चले आए हैं दश्त में
वो दर नहीं रहा कि वो निस्बत नहीं रही

बाज़ार-ए-इश्क़ में भी पुकारे गए मगर
वो दिन नहीं रहे के वो क़ीमत नहीं रही

— Gulfam Ajmeri

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