ये हक़ीक़त है, मज़हका नहीं है

वो बहुत दूर है, जुदा नहीं है

तेरे होंटों पे रक़्स करता है
राज़ जो अब तलक खुला नहीं है

जान ए जांँ तेरे हुस्न के आगे
ये जो शीशा है, आइना नहीं है

क्यूँ शराबोर हो पसीने में
मैं ने बोसा अभी लिया नहीं है

उस का पिंदार भी वहीं का वहीं
मेरे लब पर भी इल्तेजा नहीं है

जो भी होना था हो चुका काज़िम
अब किसी से हमें गिला नहीं है

— Kazim Rizvi

More by Kazim Rizvi

Other sher from the same pen

See all from Kazim Rizvi →

Naqab Shayari

Shers of naqab.

All Naqab Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling