राब्ता इश्क़ का इस बार मुकम्मल कर दूॅं
आ मेरे पास तुझे छू के मैं संदल कर दूॅं
मुझको शोहरत की ग़ुलामी नहीं अच्छी लगती
वरना मैं ठहरे हुए पानी में हलचल कर दूॅं
हिज्र से पहले तो इतनी ही मेरी ख़्वाहिश है
इक नज़र देख के उस शख़्स को पागल कर दूॅं
मेरी ख़ुद्दारी ने हर बढ़ते क़दम रोक दिए
वरना इस टाट के बिस्तर को भी मख़मल कर दूॅं
बस यही सोच के सहरा की तरफ़ लौटा हूँ
क़िस्सा-ए-इश्क़ को फिर से मैं मुसलसल कर दूॅं
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