याद आँखों को घटा करती रही
रात दिन बे-सब्र सा करती रही
काम क्या जाने दवा करती रही
पर असर तो बस दु'आ करती रही
इन दियों का मसअला जब भी उठा
फ़ैसला इनका हवा करती रही
रो पड़ा है आसमाँ फिर आज क्यूँ
बात क्या इस सेे धरा करती रही
जिस्म तो ये सो गया था रात में
रात भर ये रूह क्या करती रही
कट रहे हैं पेड़ दौलत के लिए
शाख़ ये फिर भी भला करती रही
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