अब वो पहली सी मुहब्बत फिर कहाँ
यूँँ मिले मुफ़्लिस को दौलत फिर कहाँ
लोग सब हैं शहर के मुझ सेे खफ़ा
शहर में रहती वो ज़ीनत फिर कहाँ
देखने में कोई अब अपना नहीं
उसके जैसी अब वो सूरत फिर कहाँ
हँस दिया है मेरा दुश्मन मुझ पे अब
आँख को आँसू से फ़ुर्सत फिर कहाँ
ज़िंदगी में क्यूँ हुआ है ग़म बहुत
उड़ते पंछी सी तबीयत फिर कहाँ
आइना अब सच दिखाता है नहीं
यार उस
में अब वो जुरअत फिर कहाँ
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