jee sakunga nahin main teri muhabbat ke baghair | जी सकूँगा नहीं मैं तेरी मुहब्बत के बग़ैर

  - Mukesh Jha

जी सकूँगा नहीं मैं तेरी मुहब्बत के बग़ैर
जैसे गुल खिल ही नहीं सकते सबाहत के बग़ैर

वो ज़माना गया जब इश्क़ ख़ुदा होता था
अब कोई करता नहीं इश्क़ तिजारत के बग़ैर

कैसे हासिल हो किसी को भी जहाँ में ता'बीर
ये तो मुमकिन ही नहीं तेरी इनायत के बग़ैर

ये ज़मीं इश्क़ की मुमकिन है कि दलदल निकले
पाँव मत रखना कभी मेरी हिदायत के बग़ैर

मुझ सेे जितनी भी शिकायत है तुम्हें, कह डालो
इश्क़ पे चढ़ता नहीं रंग शिकायत के बग़ैर

अहमियत कैसे समझता वो मुहब्बत में मेरी
उसको हासिल हो गया था मैं ज़रूरत के बग़ैर

  - Mukesh Jha

Khuda Shayari

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