यार की चाहत में महफ़िल तक जाते हैं
यानी हम ख़ुद ही क़ातिल तक जाते हैं
वो पत्थर है सो वो पास नहीं आता
हम दरिया हैं, सो साहिल तक जाते हैं
हालांकि एक जिस्म की बाधा आती है
पर दीवाने सीधा दिल तक जाते हैं
सोचने से ही मंज़िल नइ मिलती है दोस्त
चलने वाले ही मंज़िल तक जाते हैं
आसानी तक साथ सभी रहते हैं पर
अपने वो हैं जो मुश्किल तक जाते हैं
राह-ए-सफ़र है दुनिया, “नीरज” याद रहे
रस्ते सब इक ही मंज़िल तक जाते हैं
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