
हिज्र की वो रात थी और रात भर सोया नहीं
जिस पे मरता था मिरे मरने पे वो रोया नहीं
आस्तीं से पोछता आँसू रहा हर बार मैं
कोई इकलौती नहीं थी वो जिसे खोया नहीं
— Kanz Al Rida
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