मिल्कियत पे अपनी सुनिए अपना कब्ज़ा चाहिए
तेश से ग़ाज़ी ये बोला मुझको दरिया चाहिए
जिस तरह से दोस्तों मजनूँ को लैला चाहिए
उस तरह से मुझको भी महबूब मेरा चाहिए
इश्क़ को मेराज हो जाए मता-ए-जाँ सुनो
लहजा-ए-लैला में दुनिया को वो ख़ुत्बा चाहिए
घिर गई है हिज्र के तूफ़ाँ में कश्ती इश्क़ की
हज़रत-ए-फ़रहाद अब इसको सहारा चाहिए
दिल शजर का चल पड़ेगा ख़ुद ही राह-ए-इश्क़ पर
दिल को इन प्यारी सी आँखों का इशारा चाहिए
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