आज अपनी जान के रुख़सार पर ग़ज़लें कहूँ
यानी अपने सब सेे प्यारे यार पर ग़ज़लें कहूँ
जब तुम्हारा हुस्न बन सकता हो मौज़ू-ए-ग़ज़ल
तो मैं फिर क्यूँ तीर और तलवार पर ग़ज़लें कहूँ
कशमाकश में हूँ मुसलसल तेरा चेहरा देखकर।
पहले लब पर आँखों या रूख़सार पर ग़ज़लें कहूँ
तेरी मर्ज़ी क्या है मुझको ऐ मेरे हाकिम बता
हिज्र पे ग़ज़लें कहूँ या प्यार पर ग़ज़लें कहूँ
तुमने जो वा'दा किया है बोसे का इतवार को
तुम इजाज़त दो तो उस इतवार पर ग़ज़लें कहूँ
आईने की तरह जान-ए-मन तेरा किरदार है
दिल में आता है तेरे किरदार पर ग़ज़लें कहूँ
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