मैं अपना हाल-ए-शिकस्ता कभी बदल न सका
मैं चाह कर भी तेरी याद से निकल न सका
जो दावे करता था हर लम्हा साथ रहने के
वो दो क़दम भी मेरे साथ साथ चल न सका
मुझे ख़ुशी है मैं सोहबत से बच गया उसकी
उसे मलाल है सोहबत में उसकी ढल न सका
चराग़-ए-इश्क़ जलाया था दिल की बस्ती में
चराग़-ए-इश्क़ मगर ज़ियादा देर जल न सका
हज़ार चाहा तेरे बाद दिल बहल जाए
मगर 'शजर' ये मेरा दिल कभी बहल न सका
Read Full