
मेरे रुख़ की हँसी होंठो का नग़्मा बन गई थी वो
हयात-ए-जावेदानी का असासा बन गई थी वो
बताओ क्या सुनाऊँ दास्ताँ मैं अपनी फ़ुर्क़त की
बिछड़ के मुझ से चलता फिरता लाशा बन गई थी वो
— Shajar Abbas
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