उम्मत ने ज़ुल्म ढाया ये आल-ए-रसूल परसाया तलक ना छोड़ा मज़ार-ए-बतूल परचारों तरफ़ है फैली मदीने में रौशनीपर तीरगी है आज भी क़ब्र-ए-बतूल पर— Shajar Abbas