लगे ये कि मौजूद तू हर कहीं है
मगर है पता तू कहीं भी नहीं है
कभी चाँद, मैं और वो थी मगर अब
महज़ चाँद, मैं और कुछ भी नहीं है
मेरे संग वो दफ़्न गर हो न पाई
तो फिर मेरे किस काम की ये ज़मीं है
भले राह तकने में थम जाए साँसें
मगर लौट कर आएगी वो यक़ीं है
मेरा दिल कभी आगे बढ़ ही न पाया
जहाँ तुमने छोड़ा था अब भी वहीं है
मोहब्बत मेरी जैसी भी है मेरी है
हाँ वो बे-वफ़ा ही सही पर हसीं है
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