थक हार के हयात से फिर और क्या हुआ
वो रस्सी से किया हुआ वा'दा वफ़ा हुआ
बस आरज़ू में मौत की थे ज़िंदगी के साथ
हम से कभी न ज़िंदगी का हक़ अदा हुआ
इक शहर था कि प्यार भरे लोग थे जहाँ
जाने वो लोग क्या हुए वो शहर क्या हुआ
सागर जो बह रहा था मुयस्सर सभी को था
अब क्या झगड़ना इसपे मुझे कम अता हुआ
हर एक शख़्स में बसी है बुग़्ज़ की महक
हर एक को यहाँ है किसी ने छला हुआ
हर सम्त एक शख़्स है बिखरा हुआ यहाँ
है कैसा हाओ-हू का तमाशा लगा हुआ
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