आशिक़ों से ये न पूछो कि वो क्या कहते हैं
वो तो चेहरे की ज़ियारत को शिफ़ा कहते हैं
आपको छुप के वही लोग बुरा कहते हैं
आप ही जिनको मिरे आगे भला कहते हैं
आपको आज जो भी अपना सगा कहते हैं
देखना कल वही तक़रीर में क्या कहते हैं
जिस्म का मौत से तो कोई त'अल्लुक़ ही नहीं
रूह मरने को मिरे दोस्त क़ज़ा कहते हैं
उसका दर्शन भी ज़रूरी है इसी दुनिया में
साँस दर साँस जिसे आप ख़ुदा कहते हैं
उसको देखे जो कोई होश गँवा देता है
इसलिए लोग उसे होश-रुबा कहते हैं
इस ज़बाँ का है दु'आओं से त'अल्लुक़ कैसा
दिल से निकले उसे हम लोग दु'आ कहते हैं
कौन किरदार यहाँ देखता है अब 'आमिर'
लोग चेहरे की चमक को ही अदा कहते हैं
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