dil dhadkane men mujhe karta tang hai | दिल धड़कने में मुझे करता तंग है

  - Faiz Ahmad

दिल धड़कने में मुझे करता तंग है
दिल मिरा अब दिल नहीं एक संग है

क्या हुआ गर साथ ख़ुद के नहीं मैं
तू भी तो जानाँ कहाँ मेरे संग है

आरज़ू किस चीज़ की फिर करे वो
ज़िन्दगी से जो अपनी बैठा तंग है

उसको तो कब का लिया जीत मैंने
जिसके ख़ातिर हो रही तुम में जंग है

क्यूँँ करूँँ मैं वस्ल की ख़्वाहिशें अब
दिल फ़िराक़-ओ-ज़ुस्तज़ू में मलंग है

वो खनकने की सदा चूड़ियों की
वो सदा तेरी सुकून-ए-तरंग है

क्या करेगा कोई मेरी शिकायत
मुझ सेे तो अहमद मिरा दिल भी तंग है

  - Faiz Ahmad

Dushman Shayari

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