main KHud ko ek gadde men kyun daba raha hooñ | मैं ख़ुद को एक गड्ढे में क्यूँँ दबा रहा हूँ

  - Ajit Yadav

मैं ख़ुद को एक गड्ढे में क्यूँँ दबा रहा हूँ
इक फूल के लिए ख़ुद मिट्टी बना रहा हूँ

मालूम है मुझे वो बच्ची नहीं है फिर भी
मैं जान बूझ कर के सर पर चढ़ा रहा हूँ

जिस फूल में मिरी कुल दुनिया रची-बसी है
उस के लिए मैं दिल में सूरज उगा रहा हूँ

कोई नहीं मिला जब इस भोर के समय में
सो मैं भी क्रांति को कम्बल में सुला रहा हूँ

उस के मकान में जिस से रौशनी हुई है
उस लैम्प में मैं अपना ही ख़ून पा रहा हूँ

  - Ajit Yadav

Nature Shayari

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