zindagi-bhar ek hi kaar-e-hunar karte rahe | ज़िंदगी-भर एक ही कार-ए-हुनर करते रहे

  - Ambreen Haseeb Ambar

ज़िंदगी-भर एक ही कार-ए-हुनर करते रहे
इक घरौंदा रेत का था जिस को घर करते रहे

हम को भी मा'लूम था अंजाम क्या होगा मगर
शहर-ए-कूफ़ा की तरफ़ हम भी सफ़र करते रहे

उड़ गए सारे परिंदे मौसमों की चाह में
इंतिज़ार उन का मगर बूढे शजर करते रहे

यूँँ तो हम भी कौन सा ज़िंदा रहे इस शहर में
ज़िंदा होने की अदाकारी मगर करते रहे

आँख रह तकती रही दिल उस को समझाता रहा
अपना अपना काम दोनों उम्र-भर करते रहे

इक नहीं का ख़ौफ़ था सो हम ने पूछा ही नहीं
याद क्या हम को भी वो दीवार-ओ-दर करते रहे

  - Ambreen Haseeb Ambar

Gaon Shayari

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