हदें बढ़ने लगी थीं तीरगी की
कमी जब हो गई थी रौशनी की
ख़ुदा तू ही बता किस बात पे ये
सज़ा हमको मिली है ज़िन्दगी की
कोई करता नहीं है इंतिज़ार अब
ज़रूरत ही नहीं पड़ती घड़ी की
करें दुनिया जहाँ की फ़िक्र क्यूँ हम?
हमारी उम्र है आवारगी की
हम इक मुद्दत से रोए जा रहे हैं
चुकानी पड़ गई क़ीमत हँसी की
मैं खा कर चोट दिल पे सोचता हूँ
मुझे क्या थी ज़रूरत दिल-लगी की
ख़ुशी में याद भी आता नहीं जो
जब आया ग़म उसी की बंदगी की
मैं अब हर चीज़ से उकता चुका हूँ
मुझे मत दो दुआएं ज़िन्दगी की
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