
धुएँ की चाह में पागल हरी पत्ती जलाते हो
समझ पाए न इल्मों को तो तुम पुस्ती जलाते हो
बहुत नादान हो तुम भी तुम्हारी हरकतें क्या कम
उजाले को मिटाने के लिए बत्ती जलाते हो
— Anmol Mishra
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