ख़ामोशियाँ ग़ुलाम बनाती हैं शोर को
शब इश्क़ के उसूल सिखाती चकोर को
दिन भर तो मेरे यार मेरे यार थे बहुत
पर शाम को गया जो वो लौटा न भोर को
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