बाँटकर रोटी के टुकड़ों को तू खाना सीख ले
तू मेरी जाँ ज़िन्दगी में मुस्कुराना सीख ले
साहिलों पे वक़्त गुज़रेगा नहीं हरदम यूँँ ही
तू समुंदर की तरह से आना जाना सीख ले
चाँद-तारों से कभी रौशन नहीं होते मकाँ
तू चराग़ों को यूँँ रातों में जलाना सीख ले
अश्क़ हैं! आएँगे! आँखों की यही तासीर है
बारिशों में डूबकर फिर भीग जाना सीख ले
मुफ़लिसी दिल को कभी महसूस न होने लगे
इश्क़ करने की अदा तू जान-ए-जानाँ सीख ले
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