हर बड़ी मछली से हम तो इस तरह से डर गए
हम ने तालाबों को छोड़ा फिर नए से घर गए
जो नए से रास्ते थे मुश्किलों से थे भरे
पाँव कितनों के गए कितनों के उस
में सर गए
देर कर दी जिन में हम ने सर तलक वो आ गए
हड़बड़ी में काम सारे हम ग़लत वो कर गए
साँस का आना हुआ फिर साँस का जाना हुआ
हमको नामालूम हम ज़िन्दा हैं या फिर मर गए
अब नहीं सुनते हैं वो भी दूसरों की बात को
ज़ख़्म जितने भी थे उनके अब जो सारे भर गए
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