जब भी रखना रखना दिल से बाहर इश्क़
दिल में आग लगा देता है अक्सर इश्क़
तेरे बस जो दीवानों का काम नहीं
काहे खोल के बैठा है तू दफ़्तर इश्क़
मेरे जैसा आशिक़ मिलना नामुमकिन
चाहे आप लड़ा कर देखें सत्तर इश्क़
जो मर्ज़ी में आए हम को दें तनख़्वाह
लेकिन हम को रख लें अपना नौकर इश्क़
उसको लोगों माल-ओ-ज़र से क्या लेना
सर से पा तक जिस का हो बस ज़ेवर इश्क़
दिन तो भीड़ में कट जाता है लेकिन सुन
तेरी यादों से करता हूँ शब भर इश्क़
कोई हो तो आए सच्चा इश्क़ करे
ये ही मिसरा दोहराता है दर-दर इश्क़
मैं भी माहिर हो जाऊँगा इस फ़न में
कान में मेरे फूँक रहा है मंतर इश्क़
सोच रहा हूँ जाने कैसी लड़की है
उसको सब से हो जाता है अक्सर इश्क़
जिस को कोई काम न आए दुनिया में
ऐसा शख़्स ही कर सकता है बेहतर इश्क़
मैने जो कहा पछताने से क्या होगा
काहे सर में मार रहा है पत्थर इश्क़
ख़ुद-दारी है या है कोई मजबूरी
तोड़ रहा है फुट-पाथों पर पत्थर इश्क़
उम्र गँवा कर हमने ये जाना 'साहिल'
और नहीं कुछ ज़ख़्मों का है बिस्तर इश्क़
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