tamaam muddat mira ye shikwa raha kiran se | तमाम मुद्दत मिरा ये शिकवा रहा किरन से

  - Ashu Mishra

तमाम मुद्दत मिरा ये शिकवा रहा किरन से
कि उस ने मुझ पर नज़र न डाली कभी गगन से

मैं ज़िंदगी का दिया जला कर के जिऊँ ही पल्टा
तभी अचानक हवाएँ चल दीं क़ज़ा के बन से

पुरानी चाहत के ज़ख़्म अब तक भरे नहीं हैं
और एक लड़की पड़ी है पीछे बड़े जतन से

वो माह-पारा मिलन से पहले बहुत ख़फ़ा थी
अब उस के बोसे छुटा रहा हूँ मैं इस बदन से

मुझे असीरी में लुत्फ़ आने लगा था यारो
मैं धुन बनाता था बेड़ियों की खनन खनन से

  - Ashu Mishra

Mulaqat Shayari

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