
कभी साहिल कभी दरिया कभी मँझधार से खेलो
भरोसा बाज़ुओं पर है तो फिर पतवार से खेलो
तक़ाज़ा आशिक़ी का हो तो सर क्या दिल झुका देना
मगर ग़ैरत पे आँच आए तो फिर तलवार से खेलो
— Abdulla Asif
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