जिस तरफ़ भी हाथ डाला ग़म निकल आएहो रफ़ू कैसे बदन की दम निकल आएखा रहा था अक्स तेरा जो रहा मुझमेंथे नहीं महफूज़ ख़ुद में हम निकल आए— Dhiraj Singh 'Tahammul'