बचने की ख़बर भी न किसी यार को पहुँचे
बेकार में सदमा कहीं दो-चार को पहुँचे
तलवार से क्या चोट क़लमकार को पहुँचे
वो धार क़लम में है कि तलवार को पहुँचे
ख़िलक़त तो हमें देखने आई थी मगर हम
अख़लाक़ के मारे तिरे दीदार को पहुँचे
हम सरफिरे दस्तार के बंदे हैं सितमगर
सर ले ले मगर हाथ न दस्तार को पहुँचे
बचने में जिस आज़ार से इक उम्र लगाई
आख़िर में तो हम भी उसी आज़ार को पहुँचे
अपनों से 'सबा' हमको कोई काम नहीं है
पर चुप हैं कि ये बात न अग़्यार को पहुँचे
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