मिरा मक़ाम फ़रिश्तों के बस की बात नहीं
मैं काइनात में हूँ मुझ में काइनात नहीं
ग़म-ए-हबीब से बढ़कर ग़म-ए-हयात नहीं
ये कोई बात है लेकिन वो कोई बात नहीं
गुलों के भेस में देखा है हमने ख़ारों को
अभी की बात है माज़ी के वाक़ियात नहीं
यहाँ नज़र भी बड़े क़ाइदे से झुकती है
दयार-ए-यार है ऐ दिल हरम की बात नहीं
जो मेरे हुस्न के जल्वों से जगमगा न सके
मिरे ख़याल में वो रात कोई रात नहीं
किसे नसीब नहीं तेरे लुत्फ़ की दौलत
मुझी पे सिर्फ़ तिरी चश्म-ए-इल्तिफ़ात नहीं
ये सच है शे'र में एक लफ़्ज़ बे-वफ़ा है 'सबा'
मगर वो ख़ुद पे समझते हैं ऐसी बात नहीं
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