
अकेले पन का ये एहसास कुछ ऐसे भुलाता हूँ
मैं उस के लिक्खे गीतों को हमेशा गुनगुनाता हूँ
मैं उस को फ़ोन करता हूँ वो मुझ को डाँट देती है
ये डर भी इस क़दर है सर से पा तक थरथराता हूँ
— Jay kishan
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