ik shagufta gulaab jaisa tha | इक शगुफ़्ता गुलाब जैसा था

  - Hafeez Banarasi

इक शगुफ़्ता गुलाब जैसा था
वो बहारों के ख़्वाब जैसा था

पढ़ लिया हम ने हर्फ़ हर्फ़ उसे
उस का चेहरा किताब कैसा था

दूर से कुछ था और क़रीब से कुछ
हर सहारा सराब जैसा था

हम ग़रीबों के वास्ते हर रोज़
एक रोज़-ए-हिसाब जैसा था

किस क़दर जल्द उड़ गया यारो
वक़्त रंग-ए-शबाब जैसा था

कैसे गुज़री है उम्र क्या कहिए
लम्हा लम्हा अज़ाब जैसा था

ज़हर था ज़िंदगी के साग़र में
रंग रंग-ए-शराब जैसा था

क्या ज़माना था वो ज़माना भी
हर गुनह जब सवाब जैसा था

कौन गर्दानता उसे क़ातिल
वो तो इज़्ज़त-मआब जैसा था

बे-हिजाबी के बावजूद भी कुछ
इस के रुख़ पर हिजाब जैसा था

जब भी छेड़ा तो इक फ़ुग़ाँ निकली
दिल शिकस्ता रबाब जैसा था

इस के रुख़ पर नज़र ठहर न सकी
वो 'हफ़ीज़' आफ़्ताब जैसा था

  - Hafeez Banarasi

Khushboo Shayari

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