हम को मालूम है ये सब पगली
झुमकों में ढाती हो ग़ज़ब पगली
धड़कने तेज़ चलने लगती हैं
आती हो तुम क़रीब जब पगली
किसकी ख़ातिर ग़ज़ल सुनाते हैं
हम सेे मत पूछो तुम सबब पगली
रात यूँँ ही गुज़र न जाए अब
हमको बाँहों में लोगी कब पगली
हिज्र में ये पता लगा हम को
होती कैसी है ये तलब पगली
इक तिरी याद ने सताया यूँँ
हो चुके हैं शराबी लब पगली
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