अब ख़त्म होने को है जुनून-ए-सफ़र मिरादिखने लगा है दूर से ही मुझ को घर मिरामैं रखना चाहता हूँ तुझे याद भी सदातू लौटा देना ज़ख़्म मुझे वक़्त-पर मिरा— Harsh Kumar Bhatnagar