इशारों से इक़रार देखा
झलकता हुआ प्यार देखा
ग़मों में उन्हें यार देखा
कहाँ जंग से प्यार देखा
हमेशा जो इनकार करता
उसी का सरोकार देखा
मिले अजनबी की तरह ही
कभी भी न घर-बार देखा
बड़े और छोटे लड़े हैं
किसी को न बे-कार देखा
मुहब्बत नहीं रोज़ होती
उसी के लिए प्यार देखा
ख़ता तो हुई है किसी से
नहीं फिर ख़ता-कार देखा
हक़ीक़त वहाँ और ही थी
सभी ने गुनहगार देखा
मिले जब कभी भी "मनोहर"
वही जोश हर-बार देखा
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