क़िस्मत अगर रूठे तभी फ़ुर्सत कहाँ
नज़रे झुकाए रोज़ तो जुरअत कहाँ
हर शख़्स की होती नहीं क़ीमत यहाँ
है इल्म तो दिखती उसे सूरत कहाँ
सारे जहाँ भी देखते बुत में जिसे
बनती तराशे ही बिना मूरत कहाँ
हाँ दूर तक मिलती तबीअत है कहाँ
दिल से सफ़ा इस शहर में नफ़रत कहाँ
दिल में मुहब्बत है मेरे चाहत भी है
नादान वस्ल-ए-यार की हसरत कहाँ
सच है जहाँ में माँ अगर हो साथ तो
औलाद को उस से बड़ी दौलत कहाँ
इंसानियत से क्यूँँ उन्हें नाराज़गी
इक दूसरे को जानना फ़ितरत कहाँ
तौहीन क्यूँँ इंसान की होती कभी
फ़ितरत 'मनोहर' है जुदा सीरत कहाँ
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