man | मंदी में, महँगा सामान सँभाले हम

  - Moin Ahmed "Aazad"

मंदी में, महँगा सामान सँभाले हम
बैठे हैं, दिल में अरमान सँभाले हम

आँखों में सैलाब की, गर्दिश जारी है
और सीने में, हैं तूफ़ान सँभाले हम

होंठों पर मुस्कान सजाए, बैठे हैं
कितने होंठों की मुस्कान सँभाले हम

उल्फ़त के बाज़ार, में बेची बीनाई
लौटे हैं, फिर भी नुक़सान सँभाले हम

क़स्र मुबारक़ हो तुमको ये ख़ुशियों का
अच्छे से हैं, दिल वीरान सँभाले हम

मजबूरी ही, बाज़ीगर की हिम्मत है
रस्सी पर चलते हैं, ध्यान सँभाले हम

मतलब की इस दुनिया में भी जीते हैं
जैसे-तैसे, अपनी जान सँभाले हम

ज़र्द हुए पत्तों की क़िस्मत क्या आख़िर
टूट गए शाख़ों का मान, सँभाले हम

उसके कूचे में हर शख़्स ख़ुदा था सो
लौट आए अपनी औसान सँभाले हम

मज़लूमों की चीख़ें सुनते हैं 'आज़ाद'
बहरों की बस्ती में, कान सँभाले हम

  - Moin Ahmed "Aazad"

Shehar Shayari

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