haal-e-gulshan | हाल-ए-गुलशन

  - Sarul

हाल-ए-गुलशन

सायों से पूछते चलें
गुलशन का हालचाल
कैसा रहा चमन, कैसी रही बहार?
कैसा रहा निशात के ख़्वाबों का कारोबार?
कैसी रही ज़मीन, कैसा था आसमान?
जो था नहीं क्या याद वो आया था बार बार?

दिल टूटते रहे क्या, या सब भला सा था?
वो मिल सके क्या जिन में कोई मसअला सा था
टूटी दिलों की बर्फ़ या ख़ामोशियाँ रहीं?
सर्दियों के बीच क्या कुछ गरमियाँ रहीं?
कितने गुलों के जिस्म अबके चाक हो गए
हालात ठीक हैं या खौफ़नाक हो गए?
कैसे रहे ये दिन?
कैसा रहा ये साल?
सायों से पूछते चलें
गुलशन का हालचाल

  - Sarul

Sach Shayari

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