एक तुम ही मेरे ख़िलाफ़ नहीं
मुझको ख़ुद मेरा एतिराफ़ नहीं
यार लहजा बताने लगता है
सामने वाला दिल का साफ़ नहीं
बारगाह-ए-नज़र में जुम्बिश-ए-लब
ऐसी गुस्ताख़ियाँ मुआ'फ़ नहीं
लफ़्ज़ टूटे हुए हैं दिल के साथ
आप से ऐन शीन क़ाफ़ नहीं
दोनों प्याले हैं होश के क़ातिल
आज से ज़िक्र-ए-चश्म-ओ-नाफ़ नहीं
हिज्र वो सर्दियों का मौसम है
जिस में हासिल कोई लिहाफ़ नहीं
इस कहानी में दोनों ज़िंदा हैं
इस कहानी का इंकिशाफ़ नहीं
आप शादाबियत के मुंकिर हैं
आप से कोई इख़्तिलाफ़ नहीं
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