
ये तेरा हुस्न उफ़ पल पल मुझे घाइल ही करता है
तेरे ही इश्क़ का बस है करम जो मैं कि ज़िंदा हूँ
मुझे आवाज़ दे दे तो मैं आख़िर क्यूँ न आऊँगा
अरे मैं तो तेरा पाला हुआ आशिक़ परिंदा हूँ
— Adnan Ali SHAGAF
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