दर बना बैठा हूँ दीवार बना बैठा हूँ
और समझता हूँ कि घर-बार बना बैठा हूँ
उठता जाता है सितारे पे सितारा और मैं
वही बेदार का बेदार बना बैठा हूँ
किस मुलाक़ात की तय्यारी है और कब से है
कुछ गिरफ़्तार गिरफ़्तार बना बैठा हूँ
कहीं शो'ला ही रुका है न कहीं राख मेरी
मैं ये सब मंज़िलें बेकार बना बैठा हूँ
टूट जाता है ये लम्हा इसे जैसे भी बनाऊँ
बैठते उठते कई बार बना बैठा हूँ
ख़ुद को भुगताया है इक शख़्स को निमटाया है
ये जो इंसान सा नाचार बना बैठा हूँ
न मैं जाता हूँ यहाँ से न मैं आता हूँ यहाँ
इस गली में अजब आज़ार बना बैठा हूँ
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